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Chaitra Navratri 2022: नवरात्रि के चौथे दिन करें मां कूष्माण्डा की पूजा,होगी आयु व यश में बढ़ोत्तरी

05 Apr, 2022
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चैत्र नवरात्रि 2022 :नवरात्रि का चौथा दिन माँ दुर्गा के चौथे स्वरूप माँ कूष्मांड़ा को समर्पित है। माँ ने अपनी हल्की हंसी से पूरे ब्रह्मांड को उत्पन्न किया था, जिसके कारण इनका नाम कूष्मांड़ा पड़ा। कहा जाता है कि माँ कूष्मांडा की विधि विधान से पूजा करने से व्यक्ति निरोगी होता है। इसके साथ ही आयु व यश में भी बढ़ोत्तरी होती है। माँ कुष्मांडा की पूजा विधि, भोग और श्रृंगार के बारे में।   
        कूष्‍मांडा देवी मंत्र:                                           
या देवी सर्वभू‍तेषु मां कूष्‍मांडा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

स्तोत्र पाठ
दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःख शोक निवारिणीम्।
परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम्॥

माँ कुष्मांडा आरती (Kushmanda Aarti):

कूष्मांडा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥

पिगंला ज्वालामुखी निराली।
शाकंबरी माँ भोली भाली॥

लाखों नाम निराले तेरे ।
भक्त कई मतवाले तेरे॥

भीमा पर्वत पर है डेरा।
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥

सबकी सुनती हो जगदंबे।
सुख पहुँचती हो माँ अंबे॥

तेरे दर्शन का मैं प्यासा।
पूर्ण कर दो मेरी आशा॥

माँ के मन में ममता भारी।
क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥

तेरे दर पर किया है डेरा।
दूर करो माँ संकट मेरा॥

मेरे कारज पूरे कर दो।
मेरे तुम भंडारे भर दो॥

तेरा दास तुझे ही ध्याए।
भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥

माँ कूष्मांडा की कथा :

नवरात्रि के चौथे दिन की माँ कुष्मांडा की कथा | Navratri Day 4 - Maa  Kushmanda ki katha - YouTube


नवरात्रि का चौथा दिन माता कूष्माण्डा को समर्पित है। अपनी मनमोहक मुस्कान से इस ब्रह्मांड का निर्माण करने के कारण इन्हें देवी कूष्माण्डा के नाम से विख्यात किया गया। जिस समय सृष्टि का निर्माण नहीं हुआ था तथा चारों ओर अंधकार का वास था तब देवी कूष्माण्डा ने ही अपने ईशत हास्य के माध्यम से ब्रह्मांड की सरंचना की। उनकी इस अद्भुत लीला की वजह से उन्हें सृष्टि की आदिस्वरूपा या आदिशक्ति का नाम दिया गया। देवी कुष्मांडा की अष्ट भुजाएं हैं इसलिए उन्हें अष्टभुजा देवी भी कहा जाता है। देवी कूष्माण्डा अथवा अष्टभुजा के हाथों में क्रमशः कमंडल, धनुष,  बाण, कमल पुष्प, अमृत पूर्ण कलश, चक्र तथा गदा है। इसके साथ ही देवी कूष्माण्डा के आठवें हाथ में सिद्धियों तथा निधियों को प्रदान करने वाली जप माला धारण हैं। देवी कूष्माण्डा का प्रिय वाहन सिंह है। देवी कूष्माण्डा को कुम्हड़े की बलि अत्यंत प्रिय है। संस्कृत भाषा में कुम्हड़े को कुष्मांड कहते हैं। इस कारण भी देवी को कूष्माण्डा कहते हैं।

एक पौराणिक कथा के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। वहां निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है।इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दैदीप्यमान हैं। मां कूष्मांडा की उपासना से भक्तों के समस्त रोग-शोक मिट जाते हैं। इनकी भक्ति से आयु, यश, बल और आरोग्य की वृद्धि होती है। मां कूष्माण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से प्रसन्न होने वाली हैं।इनका वाहन सिंह है। नवरात्र -पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरुप की ही उपासना की जाती है। इस दिन माँ कूष्माण्डा की उपासना से आयु, यश, बल, और स्वास्थ्य में वृद्धि होती है।

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