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राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) क्या होता है और इसे कब लगाया जाता है, जाने इस रिपोर्ट में

21 Apr, 2022
Sachin
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रासुका कानून के तहत किसी व्यक्ति को पहले तीन महीने के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है. फिर अगर लगता है कि वह व्यक्ति अभी देश और समाज के लिए खतरा है तो तीन-तीन महीने के लिए गिरफ्तारी की अवधि बढ़ाई जा सकती है. इस कानून के तहत एकबार में तीन महीने से अधिक की अवधि नहीं बढ़ाई जा सकती है.

नई दिल्ली: राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), या रासुका 23 सितंबर 1980 को, इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान अस्तित्व में आया था. यह कानून, राज्य और केंद्र सरकार दोनों सरकारों को एक ऐसे व्यक्ति को हिरासत में लेने का अधिकार देता है जो राष्ट्र की सुरक्षा के लिए खतरा बन चुका हो या खतरा पैदा करने की कोशिश कर रहा हो. राष्ट्रीय सुरक्षा कानून जिसमें यह प्रावधान है कि सरकार, किसी संदिग्ध व्यक्ति को बिना किसी आरोप के 12 महीने तक जेल में रख सकती है.

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून और देश

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इस अधिनियम के प्रावधान

इस अधिनियम तीन प्रावधान किए गये हैं इनमें सबसे पहला देश व राज्य की सुरक्षा या लोक व्यवस्था या सामाजिक सेवा की पूर्ति को बाधित करना, दूसरा देश व राज्य की सुरक्षा को बाधित करने वालो पर उचित कार्यवाही कर उनको दण्डित करने का प्रावधान और तीसरा इस अधिनियम के तहत देश व राज्य की सुरक्षा बाधित करने वाले व्यक्ति को अधिकतम 1 साल तक हिरासत में रखा जा सकता है. इस कानून के तहत जमाखोरों की भी गिरफ्तारी की जा सकती है. और साथ ही इस  कानून का उपयोग जिलाधिकारी, पुलिस आयुक्त, राज्य सरकार अपने सीमित दायरे में भी कर सकती है.  

गिरफ्तारी की सीमा

कानून के तहत किसी व्यक्ति को पहले तीन महीने के लिए गिरफ्तार किया जा सकता है. फिर अगर लगता है कि वह व्यक्ति अभी देश और समाज के लिए खतरा है तो तीन-तीन महीने के लिए गिरफ्तारी की अवधि बढ़ाई जा सकती है. इस कानून के तहत एकबार में तीन महीने से अधिक की अवधि नहीं बढ़ाई जा सकती है. अगर, किसी अधिकारी ने ये गिरफ्तारी की हो तो उसे राज्य सरकार को  तत्काल प्रभाव से सूचित करना होगा कि उसने किस आधार पर ये गिरफ्तारी की है. जब तक राज्य सरकार इस गिरफ्तारी का प्रमाणित नहीं कर दे, तब तक यह गिरफ्तारी बारह दिन से ज्यादा समय तक नहीं हो सकती है. अगर यह अधिकारी पांच से दस दिन में जवाब दाखिल करता है तो इस अवधि को बारह की जगह पंद्रह दिन की जा सकती है. अगर रिपोर्ट को राज्य सरकार स्वीकृत कर देती है तो इसे सात दिनों के भीतर ही केंद्र सरकार को भेजना अनिवार्य होता है. इसमें इस बात का जिक्र करना आवश्यक है कि किस आधार पर यह आदेश जारी किया गया और राज्य सरकार का इसपर क्या विचार है.

कई दफा सरकार किसी व्यक्ति से बदला लेने के लिए भी इस कानून का इस्तमाल करती है, हमने देखा है कि सुप्रीम कोर्ट इस पर सरकार को लताड़ भी लगाती है

गिरफ्तारी की वैधता के आधार

गिरफ्तारी के आदेश को सिर्फ इस आधार पर अवैध नहीं माना जा सकता है कि इसमें से एक या दो कारण (1) अस्पष्ट हो (2) उसका अस्तित्व नहीं हो (3) अप्रसांगिक हो (4) उस व्यक्ति से संबंधित नहीं हो इसलिए किसी अधिकारी को उपरोक्त आधार पर गिरफ्तारी का आदेश पालन करने से नहीं रोका जा सकता है। गिरफ्तारी के आदेश को इसलिए अवैध करार नहीं दिया जा सकता है कि वह व्यक्ति उस क्षेत्र से बाहर हो जहां से उसके खिलाफ आदेश जारी किया गया है.

फरार होने की स्थिति में कानून की स्टेट शक्तियां

रासुका के तहत पकड़ा गया व्यक्ति फरार हो तो सरकार या अधिकारी, सबसे पहले उस व्यक्ति के निवास क्षेत्र के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट को लिखित रूप से रिपोर्ट दे सकता है. दूसरा अधिसूचना जारी कर व्यक्ति को तय समय सीमा के अंदर बताई गई जगह पर उपस्थित करने के लिए कह सकता है. और तीसरा अगर, वह व्यक्ति उपरोक्त अधिसूचना का पालन नहीं करता है तो उसकी सजा एक साल और जुर्माना,  दोनों बढ़ाया जा सकता है.

गिरफ्तारी की अधिकतम अवधि

गिरफ्तारी के बाद अगर उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत साबित हो जाते हैं तो उस व्यक्ति की गिरफ्तारी की अवधि एक साल तक हो सकती है. समया अवधि पूरा होने से पहले न तो सजा समाप्त की जा सकती है और ना ही उसमें फेरबदल हो सकता है.

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