Breaking news

सिद्धू मूसेवाला की हत्या में शामिल गैंगस्टर गोल्डी बराड़ ने पंजाब के कानून मंत्री और DGP को दी चेतावनी

Madrasa Survey: उत्तराखंड में भी होगा मदरसों का सर्वे, CM पुष्कर सिंह धामी ने बताया जरुरी ! Delhi News: जल्द होगा MCD Election की तारीख का ऐलान, वार्डों के प्रस्तावित नक्शे पर कमेटी ने मांगे सुझाव पश्चिम बंगाल में नबान्न अभियान को लेकर BJP और पुलिस आमने सामने, हिरासत में लिए गए शुभेंदु अधिकारी-लॉकेट चटर्जी Delhi News: AAP के दो विधायक दंगा भड़काने में दोषी करार, 7 साल पुराना है मामला; 21 सितम्बर को कोर्ट सुनाएगा सजा Mumbai News: शख्स की कार में लगी आग तो मदद के लिए आगे आए महाराष्ट्र CM एकनाथ शिंदे, रुकवाया काफिला

रानी दुर्गावती जिन्होंने शौर्य, त्याग और साहस से वीरता की एक नई इबारत लिखी

24 Jun, 2022
Sachin
Share on :

रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524  को हुआ था और 24 जून 1564 को मृत्यु हो गई थी, दुर्गावती भारत की एक ऐसी प्रसिद्ध वीरांगना थीं, जिन्होंने मध्य प्रदेश के गोंडवाना क्षेत्र में शासन किया। उनका जन्म कालिंजर के राजा पृथ्वी सिंह चंदेल के यहाँ हुआ उनका राज्य गढ़मंडला था, जिसका केंद्र जबलपुर था।

नई दिल्ली: रानी लक्ष्मी बाई की वीरगाथा से देश का हर व्यक्ति भलीभांति परिचित है लेकिन क्या आपको पता है कि भारतीय इतिहास में एक और रानी थी जिसकी आवाज से अकबर की सेना भी कांप जाया करती थी आज उन्हीं वीरांगना रानी दुर्गावती की पुण्यतिथि है। कहते है कि उन्होंने मुगलों से सीधी टक्कर ली और महान कहे जाने वाले अकबर को भी उसके सामने झुकना पड़ गया था।

रानी दुर्गावती का जन्म 5 अक्टूबर 1524  को हुआ था और 24 जून 1564 को मृत्यु हो गई थी, दुर्गावती भारत की एक ऐसी प्रसिद्ध वीरांगना थीं, जिन्होंने मध्य प्रदेश के गोंडवाना क्षेत्र में शासन किया। उनका जन्म कालिंजर के राजा पृथ्वी सिंह चंदेल के यहाँ हुआ उनका राज्य गढ़मंडला था, जिसका केंद्र जबलपुर था। उन्होंने अपने विवाह के चार वर्ष बाद अपने पति गौड़ राजा दलपत शाह की असमय मृत्यु के बाद अपने पुत्र वीरनारायण को सिंहासन पर बैठाकर उसके संरक्षक के रूप में स्वयं शासन करना प्रारंभ किया। इतिहासकारों का मानना है कि इनके शासन में राज्य की बहुत उन्नति हुई। दुर्गावती को तीर तथा बंदूक चलाने का अच्छा अभ्यास था। चीते के शिकार में इनकी विशेष रुचि थी। वे इलाहाबाद के मुगल शासक आसफ़ खान से लोहा लेने के लिये भी प्रसिद्ध हैं।

वीरांगना रानी दुर्गावती ने अपनी मातृभूमि और आत्मसम्मान की रक्षा करने के लिए प्राणों का बलिदान तक दे दिया। बांदा जिले के कालिंजर किले में 1524 ईसवी की दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण ही उनका नाम दुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही वह तेज, साहस, शौर्य और सुंदरता के कारण इनकी प्रसिद्धि चारों ओर फैल गई थी। कालिंजर दुर्ग के शासक कीर्ति सिंह की इकलौती बेटी थी दुर्गावती, जिसने मात्र 13-14 साल की उम्र में ही शेर, तेंदुआ जैसे भयंकर जानवरों को मार गिराने की महारत हासिल कर ली थी। दुर्गावती बड़े-बड़े जानवरों का शिकार किया करती थी जिसके कारण उनके साहस और वीरता की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई थी। नरभक्षी जानवरों का शिकार तो वह बड़े शौक से करती थी। युवावस्था में ही दुर्गावती अपने पिता के साथ युद्ध के मैदान में जाने लगी और युद्ध कला एवं सैन्य संचालन में बहुत जल्दी ही वह पारंगत हो गई।

वीरांगना रानी दुर्गावती ने अपनी मातृभूमि और आत्मसम्मान की रक्षा करने के लिए प्राणों का बलिदान तक दे दिया

और यह भी पढ़ें- गुजरात दंगा: PM मोदी को मिली क्लीन चिट बरकरार, जाकिया जाफरी की SC ने ख़ारिज की याचिका, जानें पूरा मामला

गोंडवाना जबलपुर में राजा संग्राम सिंह का शासन था। उनके वीर पुत्र राजकुमार दलपत शाह के पास राजकुमारी दुर्गावती की वीरता की चर्चा पहुंची, जिसके बाद राजा द्वारा विवाह का प्रस्ताव रानी दुर्गावती ने विवाह का प्रस्ताव भिजवाया गया जिसको दुर्गावती ने इनकार कर दिया। फिर क्या था कालिंजर के राजा ने आक्रमण कर दिया और पूरा राज्य जीत लिया लेकिन राजा ने परिवार के साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं किया, जिसको देखते हुए राजा ने गोंडवाना राज्य के राजा संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह से उनका विवाह करवा दिया.

राजकुमारी दुर्गावती के पति वीर राजकुमार दलपत शाह

लेकिन दुर्गावती के विवाह के बाद दुर्भाग्यवश 4 वर्ष बाद ही राजा दलपतशाह का निधन हो गया। उस समय दुर्गावती का पुत्र नारायण मात्र 3 वर्ष का ही था पति की मृत्यु के बाद दुर्गावती ने अपने नाबालिग पुत्र वीर नारायण को गद्दी पर बैठा दिया और स्वयं संरक्षिका के रूप में राज्य व्यवस्था का संचालन करने लगी। रानी दुर्गावती ने कई सामाजिक कार्य किये जैसे कि कई कुएं, मठ, बावड़ी तथा धर्मशालाएं बनवाएं। मालवा के शासक बाजबहादुर ने कई बार रानी दुर्गावती के राज्य पर हमला किया और वह हर बार पराजित हुआ. इसके बाद अकबर ने भी गोंडवाना पर हमला किया लेकिन उसकी पराजय हुई. इसके बाद स्वयं दुर्गावती ने पुरुष वेश में युद्ध का नेतृत्व किया, जिसमें 3000 मुग़ल सैनिक मारे गए थे. फिर वह कभी पलटकर नहीं आएं।

कुछ दिनों बाद आसिफ खां ने दूसरी बार आक्रमण किया। रानी और उसके सैनिकों ने एक बार फिर अकबर की सेना को परास्त कर दिया। दो बार हार से तिलमिलाए आसिफ खां ने तीसरी बार फिर हमला किया। इस युद्ध में रानी के वीर पुत्र वीर नारायण ने सैकड़ों सैनिकों को मारकर वीरगति को प्राप्त हो गए। यह देखकर दुर्गावती अपने चुने हुए 300 सैनिकों के साथ मुगल सैनिकों पर टूट पड़ीं। उसने सैकड़ों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। इसी बीच अचानक एक तीर आकर दुर्गावती की आंख में लगा, इससे पहले कि वह संभल पाती कि दुर्गावती को दूसरा तीर लग गया। जिससे वह समझ गई थीं कि अब उनका अंत करीब आ गया है। उसने अपने कटार अपनी छाती में घुसेड़ ली ताकि उन्हें दुश्मन जीवित ना पा सकें। इस तरह से दुर्गावती ने मातृभूमि की रक्षा के लिए विदेशी आक्रमणकारियों के सामने घुटने टेकने के बजाए वीरगति को प्राप्त हुईं। अकबर जैसे प्रसिद्ध सम्राट की शक्तिशाली फौज को भी दो बार पराजित कर दुर्गावती ने अप्रतिम जौहर दिखाया। आपको बता दें की 24 जून 1564 को युद्ध में लड़ते हुए वे वीर गति को प्राप्त हुईं थी। वास्तव में रानी दुर्गावती पराक्रम व वीरता की मिसाल थी, वे स्त्रीत्व के लिए एक आदर्श थी। आज भी भारत वर्ष उनके द्वारा किये गए बालिदान को याद करता है।

रानी दुर्गावती ने प्रसिद्ध सम्राट अकबर की शक्तिशाली फौज को भी दो बार पराजित कर दिया था

इसी के साथ ही आपको बता दें की रानी दुर्गावती के सम्मान में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा सन 1983 में जबलपुर के विश्वविध्यालय को उनकी याद में “रानी दुर्गावती विश्वविध्यालय” कर दिया गया. भारत सरकार ने रानी दुर्गावती को श्रद्धांजलि अर्पित करने हेतु 24 जून सन 1988 में उनकी मौत के दिन एक डाक टिकट जारी किया गया। रानी दुर्गावती की याद में जबलपुर और मंडला के बीच स्थित बरेला में उनकी समाधि बनाई गई है।

भारत सरकार ने रानी दुर्गावती को श्रद्धांजलि देते हुए 24 जून 1988 एक डाक टिकट जारी किया गया

Edited By: Deshhit News

News
More stories
छत्तीसगढ़ के सांसद राम विचार नेताम बने द्रौपदी मुर्मू के प्रस्तावक, रेणुका सिंह और संतोष पांडे ने किए हस्ताक्षर, नेताम बोले-आजादी के 75 साल बाद मिला सम्मान