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समानता, स्वतंत्रता और बन्धुत्त्व के पहरी थे डॉ. भीम राव अम्बेडकर

14 Apr, 2022
Sachin
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अम्बेडकर जब 1920 में भारत आये तो उन्होंने अपने जीवन को समाज के प्रति न्यौछावर कर दिया और वहीं से अम्बेडकर की सामाजिक न्याय और जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई और तेजी से शुरू हो गई.

नई दिल्ली: अम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को ब्रिटिश भारत के मध्य भारत प्रांत (अब मध्य प्रदेश) में स्थित महू नगर सैन्य छावनी में हुआ था. वे रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई की 14वीं संतान थे. उनका परिवार कबीर पंथ को माननेवाला मराठी मूल का था और वो वर्तमान महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में आंबडवे गाँव का निवासी था. उनका परिवार हिंदू महार जाति से संबंध रखते थे, जो उस समय अछूत जाति कही जाती थी और इस कारण उन्हें सामाजिक और आर्थिक रूप से भेदभाव का दंभ सहना पड़ता था. भीमराव आम्बेडकर के पूर्वज लंबे समय से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्यरत रहे थे और उनके पिता रामजी सकपाल, भारतीय सेना की महू छावनी में सेवारत थे तथा यहां काम करते हुये वे सूबेदार के पद तक पहुँचे थे. वह धार्मिक व्यक्ति थे और साथ ही उन्होंने मराठी और अंग्रेजी में औपचारिक शिक्षा भी प्राप्त की थी.

डॉ. भीम राव अम्बेडकर का परिवार

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अपनी अछूत जाति के कारण भीम को सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा था उनको लगभग 8 स्कूल में दाखिला नहीं मिला था लेकिन 9 वें स्कूल में कई शर्तों के साथ उनको 7 नवम्बर 1900 को रामजी सकपाल ने सातारा की गवर्न्मेण्ट हाइस्कूल में अपने बेटे भीमराव का नाम भिवा रामजी आंबडवेकर दर्ज कराया दिया था. उनके बचपन का नाम ‘भिवा’ था. आम्बेडकर का मूल उपनाम सकपाल की बजाय आंबडवेकर लिखवाया था, जो कि उनके आंबडवे गाँव से संबंधित था. क्योंकि कोकण प्रांत के लोग अपना उपनाम गाँव के नाम से रखते थे, इसलिए आम्बेडकर के आंबडवे गाँव से आंबडवेकर उपनाम स्कूल में दर्ज करवाया गया. बाद में एक ब्राह्मण शिक्षक कृष्णा केशव भिवा की प्रतिभा को देख इतने खुश हुए की उन्होंने भिवा का उपनाम आंबेडकर रख दिया था और वह उनसे विशेष स्नेह रखते थे, उनके नाम से ‘आंबडवेकर’ हटाकर अपना सरल ‘आंबेडकर’ उपनाम जोड़ दिया. तब से आज तक वे आम्बेडकर नाम से जाने जाते हैं.  

डॉ. भीम राव अम्बेडकर बचपन का फोटो

अम्बेडकर की प्राथमिक शिक्षा

आंबेडकर ने सातारा नगर में राजवाड़ा चौक पर स्थित गवर्न्मेण्ट हाईस्कूल में 7 नवम्बर 1900 को अंग्रेजी की पहली कक्षा में प्रवेश लिया. इसी दिन से उनके शैक्षिक जीवन का आरम्भ हुआ था, महाराष्ट्र में अब 7 नवंबर को विद्यार्थी दिवस के रूप में मनाया जाता हैं. जब उन्होंने चौथी कक्षा की परीक्षा उत्तीर्ण की तो उस समय उनके अछूतों समाज में ये असामान्य बात थी, इसलिए भीमराव की इस सफलता को अछूतों के बीच सार्वजनिक समारोह के रूप में मनाया गया, और उनके परिवार के मित्र एवं लेखक दादा केलुस्कर द्वारा स्वलिखित ‘बुद्ध की जीवनी’ उन्हें भेंट दी गयी. इसे पढ़कर ही उन्होंने पहली बार गौतम बुद्ध और उनके धम्म को जाना एवं उनकी शिक्षा से प्रभावित हुए.

बॉम्बे विश्वविद्यालय में स्नातक अध्ययन

1907 में, उन्होंने अपनी मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की और अगले वर्ष ही उन्होंने एल्फिंस्टन कॉलेज में प्रवेश किया, जो कि बॉम्बे विश्वविद्यालय से संबद्ध था. इस स्तर पर शिक्षा प्राप्त करने वाले वह अपने समुदाय आने वाले पहले व्यक्ति थे. 1912 में उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान में कला स्नातक की डिग्री प्राप्त की.

कोलंबिया विश्वविद्यालय में छात्र के रूप में आम्बेडकर (1915-1917)

1913 में, आम्बेडकर 22 वर्ष की आयु में उन्हें सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय स्कालरशिप प्राप्त हुई और वह न्यूयॉर्क में स्थित कोलंबिया विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त करने चले गये थे. वहां पहुँचने के तुरन्त बाद वे लिविंगस्टन हॉल में पारसी मित्र नवल भातेना के साथ बस गए. जून 1915 में उन्होंने अपनी एमसी की परीक्षा पास की, जिसमें अर्थशास्त्र प्रमुख विषय था और साथ ही समाजशास्त्र, इतिहास, दर्शनशास्त्र और मानव विज्ञान जैसे विषय भी थे. उन्होंने स्नातकोत्तर के लिए प्राचीन भारतीय वाणिज्य विषय पर शोध कार्य प्रस्तुत किया था. आम्बेडकर से उनके प्रोफेसर जॉन डेवी लोकतंत्र पर किए गये काम से प्रभावित थे.

कोलंबिया विश्वविद्यालय से की थी डॉ. अम्बेडकर ने एम.ए

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अर्थशास्त्र की डॉक्टरेट थीसिस

अक्टूबर 1916 में अम्बेडकर न्यूयॉर्क से लंदन चले आये थे और वहाँ उन्होंने ग्रेज़ इन में बैरिस्टर कोर्स के लिए प्रवेश लिया, और साथ ही लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में भी प्रवेश लिया जहां उन्होंने अर्थशास्त्र की डॉक्टरेट थीसिस पर काम करना शुरू किया. जून 1917 में, विवश होकर उन्हें अपना अध्ययन अस्थायी तौर पर बीच में ही छोड़ कर भारत लौटन पड़ा. क्योंकि बड़ौदा राज्य से उनकी छात्रवृत्ति समाप्त हो गई थी. उन्हें चार साल के भीतर अपने थीसिस के लिए लंदन लौटने की अनुमति मिली थी बड़ौदा राज्य के सेना सचिव के रूप में काम करते हुये अपने जीवन में अचानक फिर से आये भेदभाव से डॉ॰ भीमराव आम्बेडकर निराश हो गये और अपनी नौकरी छोड़ एक निजी ट्यूटर और लेखाकार के रूप में काम करने लगे. यहाँ तक कि उन्होंने अपना परामर्श व्यवसाय भी आरम्भ किया जो उनकी सामाजिक स्थिति के कारण विफल रहा.

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स अर्थशास्त्र की डॉक्टरेट की डिग्री ली थी डॉ. अम्बेडकर ने

भारत में अम्बेडकर

अम्बेडकर जब 1920 में भारत आये तो उन्होंने अपने जीवन को समाज के प्रति न्यौछावर कर दिया और वहीं से अम्बेडकर की सामाजिक न्याय और जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई और तेजी से शुरू हो गई. 31 जनवरी 1920 को डॉ. अम्बेडकर ने मूकनायक पत्रिका निकाली और उसके पहले ही अंक में जातिव्यवस्था पर कदा प्रहार करते हुए लिखा कि इस देश में जातियों की जड़े धर्म की बुनियाद तक टिकी हुई है हमें इसे सबसे पहले तोड़ना होगा और साथ ही हमें हिन्दू धर्म के अन्दर अंतर्जातीय विवाह को भी मजबूती से सहयोग करना होगा, हिन्दू धर्म में जितना अंतर्जातीय विवाह होगा ये समाज उतना ही मजबूत होगा.

भारत में सामाजिक न्याय का आन्दोलन और डॉ. अम्बेडकर

इसके बाद वह सामाजिक आन्दोलन में सक्रिय हो गये और उसकी रूप रेखा की तैयारी में जुट गये सन 1927 में, डॉ. आम्बेडकर ने छुआछूत के विरुद्ध एक व्यापक एवं सक्रिय आंदोलन आरम्भ करने का निर्णय लिया. जिसमें उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों, सत्याग्रहों और जलूसों के द्वारा, पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी वर्गों के लिये खुलवाने के लिए और अछूतों को हिंदू मन्दिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये संघर्ष करने लगे. उन्होंने महाड शहर में अछूत समुदाय को भी नगर की चवदार जलाशय से पानी लेने का अधिकार दिलाने कि लिये सत्याग्रह चलाया. 1927 के अंत में सम्मेलन में, आम्बेडकर ने जाति भेदभाव और “छुआछूत” को वैचारिक रूप से न्यायसंगत विरोध किया, मनुस्मृति का सार्वजानिक रूप से दहन किया, खुलकर जातीय भेदभाव व जातिवाद का विरोध हैं, और साथ ही सार्वजनिक रूप से निंदा की, और उन्होंने औपचारिक रूप से प्राचीन पाठ की प्रतियां जलाईं. 25 दिसंबर 1927 को, उन्होंने हजारों अनुयायियों के नेतृत्व में मनुस्मृति की प्रतियों को जलाया.

सार्वजनिक आंदोलन सत्याग्रह का नेतृत्त्व करते डॉ. अम्बेडकर

कांग्रेस और गांधी की आलोचना के बाद, राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरे

1930 तक आते-आते भीमराव आम्बेडकर देश की सबसे बडी़ अछूत राजनीतिक हस्ती बन चुके थे. उन्होंने मुख्यधारा में रहे राजनीतिक दलों की जाति व्यवस्था के उन्मूलन के प्रति उनकी उदासीनता पर कटु आलोचना की. आम्बेडकर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और उसके नेता महात्मा गांधी की भी बढ़चढ़कर आलोचना की, उन्होंने उन पर अछूत समुदाय को एक करुणा की वस्तु के रूप मे प्रस्तुत करने का आरोप लगाया और साथ ही आम्बेडकर ब्रिटिश शासन की नीतियों से भी असंतुष्ट थे, उन्होंने अछूत समुदाय के लिये एक ऐसी अलग राजनीतिक पहचान की वकालत की जिसमे कांग्रेस और ब्रिटिश दोनों का ही किसी प्रकार का दखल ना हो. लंदन में 1930, 31 और 32  के गोलमेज सम्मेलन के दौरान आम्बेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा.

डॉ. अंबेडकर की उपलब्धि

आंबेडकर का राजनीतिक जीवन 1926 में शुरू हुआ और 1956 तक वो राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय रहे. दिसंबर 1926 में, बॉम्बे के गवर्नर ने उन्हें बॉम्बे विधान परिषद के सदस्य के रूप में नामित किया था और पद पर रहते हुए उन्होंने अपने कर्तव्यों को गंभीरता से लिया, और अक्सर आर्थिक मामलों पर भाषण दिये. वे 1936 तक बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य थे. उन्होंने 1937 में लेबर पार्टी का गठन किया था. उसके बाद संविधान समिति के अध्यक्ष रहे. आजादी के बाद कानून मंत्री बनें. बाद में बॉम्बे नॉर्थ सीट से देश का पहला आम चुनाव लड़ा लेकिन हार का सामना करना पड़ा. बाबा साहेब राज्यसभा से दो बार सांसद चुने गए। वहीं 6 दिसंबर 1956 को डॉ. भीमराव अंबेडकर का निधन हो गया। उनके निधन के बाद साल 1990 में बाबा साहेब को भारत का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

संविधान के निर्माता डॉ. अम्बेडकर देश के राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को संविधान सौंपते हुए
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