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अमेरिका में गर्भपात का संवैधानिक अधिकार खत्म होते ही छिड़ी बहस, SC ने पलटा अपना 50 साल पुराना फैसला

25 Jun, 2022
Sachin
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अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने कोर्ट के इस फैसले पर निराशा जताते हुए कहा कि यह एक प्रकार से हेल्थ केयर संकट है. उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका की जनता से उनके मूलभूत संवैधानिक अधिकार छीन लिया गया है.

नई दिल्ली: अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट की ओर से गर्भपात का संवैधानिक अधिकार खत्म किए जाने के बाद से अमेरिका में गर्भपात के मामले को लेकर गंभीर बहस छिड़ गई है. वहीं, अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने कोर्ट के इस फैसले पर निराशा जताते हुए कहा कि यह एक प्रकार से हेल्थ केयर संकट है. उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका की जनता से उनके मूलभूत संवैधानिक अधिकार छीन लिया गया है. कमला हैरिस ने इस मुद्दे को लेकर अमेरिकी लोगों से एकजुट होने की भी अपील की है. मामला यह है कि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने अहम फ़ैसले में गर्भपात को क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी देने वाले 50 साल पुराने अपने ही फ़ैसले को पलट दिया है. माना जा रहा है कि इसके बाद अब महिलाओं के लिए गर्भपात का अधिकार कानूनी रहेगा या नहीं इसे लेकर राज्य अपने-अपने अलग कानून बना सकते हैं.  

अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने कोर्ट के इस फैसले पर निराशा जताते हुए कहा कि यह एक प्रकार से हेल्थ केयर संकट है

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कमला हैरिस ने क्या कहा?

अमेरिका में लाखों महिलाएं स्वास्थ्य देखभाल और प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल के बिना आज रात बिस्तर पर जाएंगी. इस समय हमारे सामने यह एक हेल्थ केयर संकट है. कमला हैरिस ने अमेरिकियों से गर्भपात के अधिकारों के रक्षा के लिए एक साथ खड़े होने का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि ये फैसला देश को पीछे की ओर ले जाएगा है. रो बनाम वेड के फैसले को पलटने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने घोषणा की कि अमेरिका में स्वास्थ्य देखभाल संकट की स्थिति में है.

अमेरिका की ओर से बुधवार यानी 22 जून को जारी आधिकारिक आंकड़ों में यह जानकारी दी गई कि, गर्भपात के अधिकारों का समर्थन करने वाले एक शोध समूह ‘गुट्टमाकर इंस्टीट्यूट’ की रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में अमेरिका में 9,30,000 से अधिक गर्भपात के मामले सामने आए. जबकि यह आंकड़ा 2017 में करीब 8,62,000 था.

अमेरिका में गर्भपात का संवैधानिक अधिकार खत्म होते ही छिड़ी बहस

क्या है रो बनाम वेड फैसला

रो बनाम वेड का ऐतिहासिक फैसला नॉर्मा मैककॉर्वी नाम की एक महिला की याचिका पर आया था. अदालती कार्यवाही के दौरान ही उनको ‘जेन रो’ नाम दिया गया था. दरअसल मामला यह था कि मैककॉर्वी 1969 में अपना अबॉर्शन कराना चाहती थीं. क्योंकि उनके पहले से ही दो बच्चे थे. वह टेक्सास में रहती थीं जहां गर्भपात गैरकानूनी माना जाता था, उसकी इजाजत तभी दी जा सकती है जब गर्भ धारण करने से मां की जान को खतरा हो. मैककॉर्वी ने फेडरल कोर्ट में याचिका दाखिल कर दावा किया कि टेक्सस का गर्भपात कानूनी असंवैधानिक है. इस मुकदमे में बचाव पक्ष के तौर पर तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट अटॉर्नी हेनरी वेड का नाम था. हालांकि बताया जाता है कि नॉर्मा मैककॉर्वी को तब गर्भपात कराने की अनुमति नहीं मिल सकी थी.

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गर्भपात को लेकर दो साल बाद आया था फैसला  

इसके दो साल बाद जनवरी 1973 में सुप्रीम कोर्ट ने मैककॉर्वी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि गर्भ का क्या करना है, गर्भपात कराना है या नहीं, ये तय करना महिलाओं का अधिकार है. जो बनाम वेड का ये फैसला ऐतिहासिक रहा जिसने अमेरिकी महिलाओं को सुरक्षित गर्भपात का अधिकार दिया. इसके बाद अमेरिका के अस्पतालों के लिए महिलाओं को गर्भपात की सुविधा देना कानूनी तौर पर बाध्यकारी हो गया था. लेकिन, कोर्ट के इस फैसले का अमेरिका के कई धार्मिक समूहों ने खूब विरोध किया था. उनका कहना था कि महिला के अंदर पल रहे भ्रूण को भी जीने का अधिकार है. ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला धार्मिक रूप से उचित नहीं है.

Edited By: Deshhit News

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