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मनमाने तरीके से गिरफ्तारी होती रही तो हम पुलिस स्टेट बन जाएँगे, लोकतंत्र में ऐसी धारणा न बनें: SC

12 Jul, 2022
Sachin
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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सिफारिश की है कि बेल एक्ट की तर्ज़ पर कोई विशेष कानून को लाने पर विचार करें. वही, कोर्ट ने केंद्र और हाईकोर्ट से चार महीने में इसकी रिपोर्ट मांगी है.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने ऑल्ट न्यूज़ के को-फाउंडर और फैक्ट-चेकर मोहम्मद जुबैर की यूपी के सीतापुर में दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया है और जमानत याचिका पर सुनवाई शुरू कर दी है.  इस केस पर जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना की बेंच सुनवाई कर रही है. इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ उत्तर प्रदेश के सीतापुर में धार्मिक भावनाओं को आहत को लेकर एक मामले में पांच दिन की अंतरिम जमानत दी थी. लेकिन वहीं, दूसरी ओर जेल नहीं बल्कि बेल नियमों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त हो गया है. एक ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने  ग़ैरज़रूरी गिरफ्तारी और रिमांड पर सवाल उठाए. सुप्रीम कोर्ट ने जमानत देने के लिए नए कानून की वकालत की है.   

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सिफारिश की है कि बेल एक्ट की तर्ज़ पर कोई विशेष कानून को लाने पर विचार करें. वही, कोर्ट ने केंद्र और हाईकोर्ट से चार महीने में इसकी रिपोर्ट मांगी है. जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ द्वारा दिए गए फैसले में कहा गया है कि लोकतंत्र में ये धारणा ना बने कि यह एक पुलिस राज्य है.

नए बेल एक्ट कानून पर विचार करें सरकार- कोर्ट 

जस्टिस संजय किशन कौल एवं जस्टिस सुंद्रेश की पीठ ने सरकार से जमानत देने की प्रक्रिया को और बेहतर बनाने के लिए नए कानून बनाने की अपील की है. बेंच ने कहा कि वर्तमान समय में गिरफ्तारी पर नए कानून की जरूरत है. कोर्ट ने आगे कहा कि आरोपी की नियमित जमानत अर्जी पर सामान्य रूप से दो सप्ताह के भीतर और अग्रिम जमानत अर्जी पर निर्णय छह सप्ताह के भीतर फैसला करना होता है. कोर्ट ने राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे लोगों को गिरफ्तार करने से पहले सीआरपीसी की धारा 41 एवं 41ए का पालन करें.

जस्टिस संजय किशन कौल एवं जस्टिस सुंद्रेश

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लोकतंत्र में पुलिस राज की छवि नहीं बना सकते

जस्टिस एसके कौल और एमएम सुंदरेश की पीठ ने सीबीआई द्वारा पकड़े गए एक व्यक्ति के मामले पर सुनवाई करते हुए कहा कि, आज भी देश की अपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता, आजादी से पहले बनाए गए दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों में कुछ बदलावों के साथ लगभग उसी रूप में हैं. शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि सामाजिक कार्यकर्ताओं, नेताओं और पत्रकारों सहित कई विचाराधीन कैदियों की जमानत याचिकाओं को देखते हुए नए जमानत कानून को तैयार करने पर विचार करने की जरुरत है. शीर्ष अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में ऐसी छवि कभी नहीं बन सकती है कि यह पुलिस राज है.

भारत में जेल विचाराधीन कैदियों से भरे पड़े हैं

पीठ ने कहा कि, भारत में जेल विचाराधीन कैदियों से भरे पड़े हैं. जो डाटा हमारे सामने आया है उसे देखने पर लगता है कि जेल में विचाराधीन कैदियों की संख्या बहुत ज्यादा है. ऐसे कैदियों में गरीब एवं अनपढ़ और महिलाएं ज्यादा हैं. कोर्ट का मानना है इन गिरफ्तारियों में जांच एजेंसियों में औपनिवेशिक मानसिकता की संस्कृति मिलती है. अदालत ने आगे कहा कि जमानत नियम अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) का आधार है. कोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारी का कर्तव्य है कि वह गिरफ्तारी की वजहों को लिखे. कोर्ट ने अफसोस जताया कि जांच एजेंसियां उसके पहले के आदेशों का पालन नहीं कर रही हैं.

Edited By: Deshhit News

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