चुनावी बांड मामला : प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, निजता का अधिकार निगमों पर लागू नहीं होता

02 Nov, 2023
Deepa Rawat
Share on :

Deprecated: explode(): Passing null to parameter #2 ($string) of type string is deprecated in /var/www/html/wp-content/themes/deshhit/single.php on line 75

नई दिल्ली, 2 नवंबर (आईएएनएस)। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने चुनावी बांड योजना की वैधता पर दी गई दलीलों पर अपना जवाब दाखिल करते हुए सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि निजता का अधिकार निगमों पर लागू नहीं होता, क्योंकि ऐसे अधिकार व्यक्तियों को मिलते हैं।

उन्होंने कहा कि गोपनीयता के तर्क का उपयोग यह कहने के लिए नहीं किया जा सकता कि यह नागरिकों के सूचना के अधिकार को खत्म कर दे।

भूषण ने यह भी कहा कि निजता का अधिकार कंपनियों तक नहीं बढ़ाया जा सकता…भले ही यह किसी व्यक्ति का अधिकार हो, क्या व्यक्ति निजता के अधिकार का दावा कर सकता है जो सूचना के अधिकार से आगे निकल जाता है? उन्‍होंने अदालत में केंद्र की उस दलील का जवाब देते हुए यह बात कही, जिसमें नागरिकों के जानने के अधिकार को सूचनात्मक गोपनीयता के अधिकार के खिलाफ बताया गया है।

केंद्र ने अपना रुख बरकरार रखा कि यह योजना भारत में चुनावी प्रक्रिया में नकद लेनदेन को खत्म करने और उचित बैंकिंग चैनलों के माध्यम से राजनीतिक फंडिंग के लिए सफेद धन का उपयोग सुनिश्चित करने के लिए एक बड़े डिजाइन का हिस्सा है।

इसने यह भी कहा है कि गोपनीयता वह धागा है जो योजना के डिजाइन को एक साथ रखता है, जबकि भूषण ने शीर्ष अदालत से गुमनामी को दूर करने का आग्रह किया है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 19 (1) ए के तहत मौलिक अधिकार का हनन करता है।

सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, “आपका आधिपत्य जानने के सामान्य अधिकार के मुकाबले सूचनात्मक गोपनीयता के मेरे अधिकार को स्वीकार कर सकता है। यदि प्रकटीकरण में वास्तविक सार्वजनिक हित है, तो आप अदालत में जाते हैं। लेकिन केवल बाहर ही, आप किसी की निजता पर आक्रमण नहीं कर सकते।”

उन्होंने अदालत से यह भी कहा कि गोपनीयता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के प्रतिकूल नहीं है। यह कभी-कभी स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को बढ़ाता है, जैसा कि इस मामले में है।”

उन्होंने आगे कहा कि यह योजना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों को बढ़ावा देती है, क्योंकि यह दान को नकदी से बैंकिंग चैनलों में स्थानांतरित कर देती है।

हालांकि, भूषण ने कहा कि केंद्र के इस तर्क के बावजूद कि एसबीआई अदालत के आदेश के बिना जानकारी नहीं दे सकता, जानकारी अभी भी उपलब्ध है और कंपनी को प्रताड़ित करने की संभावना अभी भी बनी हुई है। उन्होंने अपने पिछले तर्क की फिर से पुष्टि की कि सत्तारूढ़ दल को पता चल सकता है और सरकार जानकारी प्राप्त करने के लिए एसबीआई पर दबाव डाल सकती है और यह केवल विपक्षी दल को नहीं पता है।

उन्होंने कहा, “सरकार एसबीआई पर जानकारी देने के लिए दबाव डाल सकती है, अन्यथा भी सरकार यह देखकर जान सकती है कि किस कंपनी ने कितनी रकम दान की है।”

इससे पहले चयनात्मक गुमनामी पर चुनौती का जवाब देते हुए एसजी मेहता ने कहा कि ऐसा कोई तरीका नहीं है , जिसके द्वारा कोई भी ट्रेस करने योग्य पदचिह्न छोड़े बिना एसबीआई से जानकारी तक पहुंच सके। उन्होंने जोर देकर कहा कि केंद्र चुनावी बांड के माध्यम से किए गए दान का विवरण नहीं जान सकता। उन्होंने इस मुद्दे पर एसबीआई के अध्यक्ष द्वारा हस्ताक्षरित एक पत्र रखा और कहा कि अदालत के आदेश के बिना विवरण तक नहीं पहुंचा जा सकता।

वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अपने जवाब में कहा कि चुनावी बांड योजना सबसे असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक और अनुचित योजना है, जो संविधान की मूल संरचना को नष्ट कर देती है।

उन्होंने कहा, “स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव बुनियादी संरचना है। यह मुफ़्त नहीं है, क्योंकि उद्योगपति ‘नहीं’ नहीं कह सकते और यह उचित नहीं है, क्योंकि सत्तारूढ़ दल को सबसे अधिक लाभ मिलता है।” उन्होंने आगे पूछा कि जानकारी छिपाकर कौन सा जनहित पूरा किया जा रहा है?

सिब्बल ने इस योजना को राजनीतिक स्थायित्व सुनिश्चित करने का एक तरीका बताते हुए कहा कि सरकार सिर्फ अपना बचाव कर रही है, क्योंकि वह जानती है कि किसने कितना दान दिया।

सीपीआई-एम की ओर से पेश होते हुए वकील शादान फरसाट ने पूछा, आप बदले की भावना को कैसे रोकेंगे? उन्होंने कहा कि बदले की भावना को रोकने का एकमात्र तरीका सार्वजनिक प्रकटीकरण है।

वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने यह भी पूछा कि हजारों निगमों की गोपनीयता 140 करोड़ नागरिकों के अधिकारों पर कैसे हावी हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने लगातार तीन दिनों तक सुनवाई के बाद चुनावी बांड योजना को मिली चुनौतियों पर गुरुवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। हालांकि, अदालत ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह 30 सितंबर तक सभी राजनीतिक दलों द्वारा चुनावी बांड के माध्यम से प्राप्त धन का विवरण दो सप्ताह की समय अवधि के भीतर अदालत में जमा करे।

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, निज़ाम पाशा, कपिल सिब्बल, हंसारिया, संजय हेगड़े और अधिवक्ता फरासत सहित याचिकाकर्ता वकीलों ने चुनावी बांड योजना की संवैधानिकता, वैधता और भारतीय लोकतंत्र के लिए इससे उत्पन्न खतरे के प्रति सचेत करते हुए कई तर्क दिए गए हैं।

सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ में शामिल न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, बी.आर. गवई, जे.बी. पारदीवाला और मनोज मिश्रा ने गुरुवार को दोनों पक्षों – केंद्र और योजना को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनीं।

–आईएएनएस

एसजीके